दुष्यन्त कुमार की कविताओं में देश की दशा पर व्यथा

Authors

  • उमाकान्त शोध छात्र, क्राइस्ट चर्च पी0जी0 कॉलेज, कानपुर।

Abstract

एक विस्तृत भू-भाग जिस पर विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, जाति-वर्गों के लोग स्वतंत्रतापूर्वक अपना जीवन जीने में संलग्न हैं; विभिन्न रीति-रिवाज़ों-संस्कारों से जुड़कर समाज का निर्माण किए हुए एक साथ चलने का प्रयत्न कर रहे हैं- सबका एक सामूहिक नाम ‘देश’ अत्यंत छोटे शब्द द्वारा परिभाषित सामूहिक पहचान लिए हुए है। दुष्यन्त कुमार के काव्य में देश की दशा और उसकी व्यथा पर चिंता व्यक्त की गयी है। दुष्यन्त कुमार को जन-जन की पीड़ा के कवि के रूप में पहचाना जाना चाहिए, क्योंकि उनका साहित्य उनके देश के प्रति लगाव, चिन्ता और उसके बदहाल होने की स्थिति पर बेचैनी को व्यक्त करता है। स्वतंत्रता के बाद के भारत की तस्वीर खींचते हुए दुष्यन्त जी ने चिंता व्यक्त की है उन्हें राजनीति की बाँबी में घुसे अनेक ज़हरीले सांपों द्वारा देश को कभी भी डसे जाने का भय सताता है। वे वास्तव में जनता के ऐसे प्रतिनिधि कवि हैं जो स्वयं कष्टों को भोगकर उन्हें अपनी लेखनी द्वारा समाज हित में समर्पित करते हैं। न जाने कितनी पीढ़ियाँ गुजर गईं समस्याओं से जूझते हुए मगर देश की हालत अब भी सोचनीय है। देश की जनता पहले विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा सताई गई और बाद में अपने ही देश के कुछ पूँजीपतियों, नेताओं औैर नौकरशाहों द्वारा शोषण का शिकार हो रही है, उसे केवल वोटों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

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Published

2019-01-01

How to Cite

उमाकान्त. (2019). दुष्यन्त कुमार की कविताओं में देश की दशा पर व्यथा. Sameeksha Global [ISSN: 2581-401X], 3(1). Retrieved from https://stm.eurekajournals.com/index.php/Sameeksha/article/view/1069

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