पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत कृषि आधारित उद्योगों का विकास (जनपद कानपुर देहात के विशेष सन्दर्भ में)
Abstract
आर्थिक विकास का ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक विकास की सैद्धान्तिक व्याख्या यह स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में, प्रत्येक अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान होता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुभव भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। कृषि समस्त उद्योगों की जननी, मानव जीवन की पोषक, प्रगति की सूचक तथा सम्पन्नता की प्रतीक समझी जाती है। तीव्र आर्थिक विकास की ओर उन्मुख वर्तमान गतिशील विश्व के समस्त विकसित एवं विकासशील देश अपने उपलब्ध संसाधनों का अपनी परिस्थितियों एवं क्षमताओं के अनुरूप यथासम्भव अनुकूलतम उपयोग कर कृषि उत्पादों में परिमाणात्मक एवं गुणात्मक सुधार तथा प्रगतिशील एवं व्यावसायिक कृषि के विकास हेतु सचेत एवं सतत प्रयासरत हैं। विकासशील राष्ट्रों में प्रधान व्यवसाय होने के कारण कृषि राष्ट्रीय आय का सबसे बड़ा स्रोत, रोजगार एवं जीवनयापन का प्रमुख साधन, औद्योगिक विकास, वाणिज्य एवं व्यापार का आधार है। निर्धन एवं विकासशील राष्ट्र अपने सीमित साधनों द्वारा आर्थिक विकास की ऊँची दर तब तक प्राप्त नहीं कर सकते जब तक कि वे आधारभूत कृषि उद्योग का विकास न कर लें। इन देशों में आर्थिक विकास के लिए कृषि विकास पर इसलिए भी ध्यान दिया जाता है क्योंकि कृषि क्षेत्र में पूँजी-उत्पाद अनुपात अधिक ऊँचा नहीं होता तथा कृषि विकास के लिए विदेशी पूँजी की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती जितनी कि औद्योगिक विकास के लिए पड़ती है। कृषि विकास के सोपान पर चढ़कर ही विश्व के विकसित राष्ट्र आज आर्थिक विकास के शिखर तक पहुँचे हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसके कारण यहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। अतः देश के आर्थिक विकास के लिए कृषि विकास आवश्यक है। चूँकि उद्योग को सम्पन्नता व कृषि को पिछड़ेपन का सूचक माना जाता है, इसलिए प्रत्येक राष्ट्र औद्योगीकरण द्वारा देश के आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने का प्रयास करता है। कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश अन्य उद्योगों की स्थापना के स्थान पर कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना कर देश के आर्थिक विकास को तीव्र कर सकते हैं।