मैनेजर पाण्डेय की साहित्येतिहासिक दृष्टि
Abstract
साहित्य अपने अन्तरतम में बड़ा ही विराट कलेवर संजोए हुए हैं। आज तक न तो इसके स्वरूप का समुचित मूल्यांकन हो पाया है और न ही इसके प्रयोजन का। इसका सबसे प्रमुख कारण दृष्टिकोणों की विभिन्नता है। विभिन्न दृष्टिकोणों से इसे परिभाषित और व्याख्यायित करने की एवं इसे स्वरूप प्रदान करने की चेष्टा विज्ञ समुदाय द्वारा समय-समय पर चलती रहती है। साहित्य का अपना एक इतिहास भी होता है और मूलभूत बुनियादी दर्शन भी। लेकिन आलोचना के अभाव में वह निरर्थक सा प्रतीत होता है। मेरे विचार से साहित्य के ऐतिहासिक दृष्टि से मूल्यांकन के लिए उसके ऐतिहासिक स्वरूप तथा सामाजिक प्रयोजन को ध्यान में रखना आवश्यक है। मैनेजर पाण्डेय जी की भी इस सन्दर्भ में यह मान्यता है कि- ‘‘साहित्यिक रचनाएँ इतिहास से निर्मित होती है और इतिहास का निर्माण भी करती हैं। रचना का अस्तित्व इतिहास के भीतर होता है, इतिहास के बाहर नहीं।’’1 किसी भी काल की रचनात्मक उपलब्धि से हम उस काल के इतिहास का पता आसानी से लगा सकते हैं।