हिन्दी का प्रवासी साहित्य-एक विहंगम दृष्टि

Authors

  • डॉ वृंदा विजयन सहप्रोफ़सर, हिंदी विभाग, कोचिन कॉलेज (सेल्फ फाइनेंसिंग), कोच्चि -2

Abstract

हिन्दी साहित्य रूपी विशाल वटवृक्ष के असंख्य समृद्ध एवं सशक्त शाखाओं में से एक है प्रवासी साहित्य। आज प्रवासी साहित्य दिन- प्रतिदिन अपनी रचनाधर्मिता के ज़रिए हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाता जा रहा है। इस संदर्भ में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि प्रवासी साहित्य हिन्दी साहित्य क्षेत्र को सघन बनानेवाली एक सशक्त विधा या नई चेतना है, जो प्रवासी लोगों के मनोविज्ञान से भी संबन्ध रखती है। प्रवासी साहित्य असल में एक नई अंतर्दृष्टि है, जो पर्याप्त समय लगाकर पाठकों के दिल एवं साहित्य के क्षेत्र में खुद का एक अक्षुण्ण स्थान बनाने में बेहद कामयाब हुई है। साहित्य की यह विधा आज ज़रूर अपनी संवैधानिक रचनाधर्मिता के ज़रिए बडी गहराई से अपनी जडें जमा चुकी हैं।

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Published

2019-01-01

How to Cite

विजयन ड. व. . (2019). हिन्दी का प्रवासी साहित्य-एक विहंगम दृष्टि. Sameeksha Global [ISSN: 2581-401X], 3(1). Retrieved from https://stm.eurekajournals.com/index.php/Sameeksha/article/view/1075

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