मनरेगा में वित्तीय एवं सामाजिक समावेशन दृष्टिकोण
Abstract
इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि आजादी के आठ दशकों के गुजर जाने, देश में जनतांत्रिक एवं लोककल्याणकारी सरकारों की लम्बी-चौड़ी विकास यात्राओं के बावजूद वैश्विक परिदृश्य में गरीबों एवं बेरोजगारों की सबसे बड़ी फौज भारत में है। यहाँ गरीबी, बेरोजगारी एवं आय विषमताएँ जैसी सामाजिक बुराईयाँ दैत्याकार स्वरूप को प्राप्त कर चुकी हैं। यहाँ धन एवं आय के वितरण की विषमता कम होती नजर नहीं आती है। समाज का एक ऐसा वर्ग भी है जो ऐशो-आराम की जिन्दगी व्यतीत करता है, दुनिया की सारी सुख-सम्पदा एवं सुविधाओं से लैश है, आसमाँ को छू लेने की तमन्ना रखनेवाली गगनचुम्बी इमारतों में रहता है तो इससे इतर गाँवों, कस्बों, झुग्गी-झोपड़ियों, यहाँ तक कि पेड़ों की छाँव एवं खुले आसमान की छतरी में बसेरा लेने वाले सदियों से दलित, शोषित, पीड़ित एवं उपेक्षा के शिकार समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जिनके टूटे-फूटे बर्तन, फटी आँखें, सुर्ख चेहरे, माथे पर चिंता की लकीरें, अर्द्धनग्न, चिथड़ों में लिपटे बदन उनके आर्थिक एवं सामाजिक रूप से अपाहिज होने की गवाही देते हैं। दाने-दाने को मोहताज इन बेवस एवं लाचारों के लिए जीने या मरने की कोई खुशी या गम नहीं होता।