अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में नवीन विधाओं की रचनाधर्मिता
Abstract
ज्ञान के प्रकाशन की अविच्छिन्न परंपरा में संस्कृत वाङ्मय चिरकाल से उदित सूर्य की भांति जनमानस को आलोकित करता हुआ दिखाई पड़ता है। इस वाङ्मय में समाहित ज्ञानराशि इतना विशाल है कि समाज एवं जीवन के लिए उपयोगी अत्यन्त सूक्ष्म तत्व भी इससे अछूते नहीं हैं तथा इस साहित्य में उनका गहन चिन्तन प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत की इसी व्यापकता के कारण इसका साहित्य कालजयी बना रहा। चूंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिये समय की आवश्यकता एवं परिवर्तन के आधार पर संस्कृत साहित्य के सृजन में भी विषय एवं विधाओं में तदनुकूल परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। यह परिवर्तन साहित्य के प्राचीन विधाओं एवं विषयों को आत्मसात् करते हुए आधुनिक विषयों को ग्रहण करने एवं वैश्विक स्तर पर होने वाले साहित्यिक रचनाओं के अनुसार भी नवीन विधाओं की रचना के रूप में परिलक्षित होते हैं।