हिन्दी दलित काव्य में अभिव्यक्त स्त्री की संवेदना
Abstract
19वीं सदी का दौर स्त्री जीवन के सुधार का दौड़ माना जा सकता है। सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से स्त्री को सबल और सुदृढ़ करने की ओर चिंतकों और विचारकों का प्रयास आरम्भ हुआ। जिसका परिणाम भी सामने आया है। साहित्य से लेकर समाज सुधारक सबने स्त्री की वेदना और पीड़ा को समझा है। भारत के संदर्भ में यदि कहे तो ‘सीमॉंन द बोआर’ की रचनाओं से अधिक भारतीय चेतना में स्त्री के प्रति नवीन दृष्टिकोण के जागृत होने में महादेवी का अधिक योगदान है। धीरे-धीरे समाज-सुधारकों, साहित्यकारों, चिंतकों के प्रभाव से कानूनी सामाजिक, आर्थिक संबल, भारतीय नारी को प्राप्त हुआ। बाबा साहेब भीम राव अम्बेदकर के द्वारा निर्मित ‘हिन्दू कोड बिल’ इसका सशक्त प्रमाण है। अम्बेदकर की यह मान्यता थी कि स्त्री के उन्नति के बिना समाज की उन्नति नहीं देखी जा सकती। दलित काव्य पर अम्बेदकर का प्रभाव है, इसीलिए दलित साहित्य रचना में उनके विचार स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ते है।