शक्त्युपासना का तात्त्विक-रहस्य

Authors

  • सत्यनारायण भारद्वाज
  • ममता शर्मा

Abstract

सृष्टि के प्रारम्भ से अद्यावधि-पर्यन्त शक्ति-तत्व का समाराधन किया जाता रहा है। आगम-ग्रन्थों में शक्ति-उपासना के सम्बन्ध में जिस पद्धति का विवेचन उपलब्ध होता है वह काल भेद से तीन कल्प के रूप में वर्णित है। दनुपुत्र रम्भ के द्वारा पंचाग्नि-साधना किये जाने से यह प्रथम रम्भ-कल्प कहलाता है। चूंकि इस कल्प में अष्टादश-भुजाओ वाली देवी की उपासना की जाती रही है अतः इसका उग्रचण्डा-कल्प भी नाम है यह कल्प श्रीरामावतार पर्यन्त सेवित रहा है। नीललोहित-कल्प अथवा भद्रकाली-कल्प के रूप में प्रसिद्ध द्वितीय कल्प में षोड़श- भुजाओ वाली देवी की उपासना की जाती रही है जो श्रीकृष्णावतार पर्यन्त सेवित रही। हिरण्याक्ष दैत्य द्वारा सप्तद्वीपा वसुमती को समुद्र में डुबो दिये जाने से व्यथित देवो की प्रार्थना पर भगवान नारायण ने विशाल श्वेत वर्ण के वाराह का रूप धारणकर इस धरा का उद्धार किया था फलतः यह तृतीय श्वेतवाराह-कल्प के रूप में आज तक प्रसिद्ध है। इस कल्प में दश-भुजाओ वाली सौम्य-स्वरूपा कात्यायनी देवी की उपासना की जाती रही है। प्रकृत विषय का विस्तृत विवेचन इस शोध आलेख का प्रतिपाद्य है।

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Published

2025-01-30

How to Cite

भारद्वाज स. ., & शर्मा म. . (2025). शक्त्युपासना का तात्त्विक-रहस्य. Sameeksha Global [ISSN: 2581-401X], 9(1 (Jan-Jun). Retrieved from https://stm.eurekajournals.com/index.php/Sameeksha/article/view/950